मांधाता में भाजपा को बड़ी शिकस्त होने का अंदेशा?, संहिता के पहले, शिवराज ने संभाला मोर्चा

शिवराज भाजपा मांधाता

खंडवा (नवभारत न्यूज).  सत्ता में रहने के बावजूद मांधाता में इस बार भाजपा प्रत्याशी को हर जगह विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उनसे यही सवाल पूछा जाता है कि मतदाताओं ने उन्हें चुना, फिर विश्वासघात कर वे भाजपा में क्यों आए?

निरू त्तर प्रत्याशी लोगों को समझा नहीं पाते। लोग पूछते हैं कि दो साल विधायक रहकर क्या किया? वे सिर्फ यही कह पाते हैं कि कांग्रेस ने उनके साथ धोखा किया। उनके द्वारा बताए काम कमलनाथ सरकार ने नहीं किए। नाराज होकर इसीलिए भाजपा में आया हूँ।

इसी तरह भाजपा प्रत्याशी नारायण पटेल के विधायक बनते ही क्षेत्र में कई लोग उनके समर्थकों के कोप का शिकार भी हुए। ऐसे लोग भी इस उपचुनाव में मतदान का रास्ता देख रहे हैं। नोटा का बटन पिछली बार एवं इससे पहले हजार की संख्या में लोगों ने दबाया था।

बताते हैं कि नारायण पटेल खुद के पोलिंग सेंटर से ही हार गए थे। क्षेत्र में चर्चा है कि अब भाजपा ने इन पर दांव लगाकर एक तरह से आफत ही मोल ले ली है। संगठन के गुपचुप सर्वे में भी इस सीट पर भाजपा को चिंतन करने की जरूरत महसूस हो रही है।

संगठन के बड़े नेता और बड़े जनप्रतिनिधि भी सकते में हैं कि मांधाता को जिताने में इस बार ऐड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। भाजपा मांधाता में बड़ी शिकस्त के करीब नजर आ रही है। इसीलिए आचार संहिता से पहले मुख्यमंत्री यहाँ 23 सितंबर को पहुंच रहे हैं.

लेकिन यहाँ की जनता का मिजाज कुछ ठीक नहीं लग रहा है। हो सकता है कि यहाँ से जाते ही 25 सितंबर तक आचार संहिता लग जाए। सबसे बड़ा मुद्दा तो बेरोजगारी का है। नारायण पटेल से दस साल पहले तक भाजपा के विधायक रहे।

उन्होंने भी बेरोजगारी खुद की दूर की। इसी वजह से लोगों ने तंग आकर कांग्रेस को जिताया। दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि कांग्रेस से विधायक बनकर वे ही नेता फिर भाजपा के टिकिट से चुनावी समर में हैं। मांधाता विधानसभा क्षेत्र संपन्न धरोहरों वाला है।

यहाँ विश्वप्रसिद्ध ज्योर्तिलिंग है। इंदिरा सागर और ओंकारेश्वर सागर जैसे डेम हैं। दो बड़े बिजली के हाइडल (पन बिजली) और थर्मल यानि कोयले से बनने वाली बिजली का कारखाना है। सिंगाजी जैसे संत की समाधी है।

हनुमंतिया जैसा पर्यटन स्थल है। सीमेंट के कारखाने भी भविष्य में बन सकते हैं। इससे भी बड़ी बात यह सामान्य सीट है। मतलब साफ है कि यहाँ खरबों के कारखाने व रोजगार के स्रोत हैं। फिर भी बेरोजगारी क्यों? नेताओं को शर्म आनी चाहिए,

कि वे किस मुँह से जनता के सामने कुर्ते को झोली बनाकर वोट मांगने जाओगे। इन सबके बावजूद क्यों यहाँ का युवा रोजगार के लिए तड़प रहा है। जरा से ठेकेदारी वाले वेतन में ऐसे खतरनाक काम भी कर रहा है, जिससे मौतें तक हो गईं?

मेहनतकश किसानों को नहरों से समय पर पानी तक नहीं मिलता। अरबों रुपए कमाने वाली बिजली परियोजनाओं ने क्या इस कमाई का आधा प्रतिशत भी क्षेत्र पर खर्चा किया है? इन मुद्दों पर तीन पारियों में विधायक बने नेताओं ने क्यों खुलकर बात नहीं की।

अब फिर उप चुनाव मांधाता पर थोप दिया गया है। ऐसे में क्या मुँह लेकर दोनों ही दलों के नेता जनता के बीच जाएंगे। बड़ी परियोजनाओं के बावजूद क्यों बिहार, झारखंड से बुलाकर लोगों से काम करवाए जा रहे हैं?

स्थानीय चुने हुए पिछले तीन बार के जनप्रतिनिधियों को शर्म आनी चाहिए। उन्होंने खुद के विकास के अलावा स्थानीय मतदाताओं के बारे में क्यों नहीं सोचा? अब फिर चुनाव लडऩे आ गए। यही वजह है, कि मांधाता विधानसभा चुनाव के दौरान 1575 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था।

इतना ही नहीं साल 2013 के चुनाव में तो इन कुर्ते वाले नेताओं से चिढ़कर 3114 मतदाताओं ने वोट जरूर दिया, लेकिन बटन नोटा का दबाया। मतलब वे किसी भी दल या निर्दलीय को वोट देना नहीं चाहते थे। लोकतंत्र के लिए यह परिस्थिति शर्मनाक है।

फिर भी चिकने घड़े पर पानी की तरह ये सारे मुद्दे फिसल गए। जनता की अनइच्छा के बावजूद जीतना तो किसी एक को तय था। ये नेता 2008,2013 और 2018 में जीत भी गए। इन्होंने जनता की भलाई और विकास के नाम पर कुछ ऐसा नहीं किया,

जिससे इनका चुना जाना सार्थकता को दर्शाए। मांधाता विधानसभा क्षेत्र 175 में मतदाताओं की संख्या2018 के चुनाव में 18 लाख 4594 ती। जिसमें पुरूष मतदाता 96657, महिला मतदाता 87936 तथा अन्य मतदाता 1 था।