बचपन का डाक-टिकटों के संग्रह का शौक, बुढ़ापे में बना जुनून, कई साथियों का बनाया करियर

टिकटों

  • डाक-टिकटों का संग्रह विश्व के सबसे लोकप्रिय शौक में से एक.
  • डाक टिकट राष्ट्र की सभ्यता, संस्कृति व विरासत का प्रतिबिंब.

खंडवा. आज आधुनिकता के दौर में मोबाइल, इंटरनेट का चलन इतना बढ़ गया है कि पोस्ट ऑफिस और पत्रों की संख्या न के बराबर हो गई है। लेकिन डाक टिकटों की महत्ता यदि जाननी है तो डाक टिकट के शौकीन सुशील पाराशर से पूछिये कि वे कितने कीमती होते हैं।

और उनमें क्या कहानी छिपी होती है। हर डाक टिकट अपने आप में एक कहानी, इतिहास और धर्म संस्कृति को संजोये हुए रहता है, जो आम आदमी नहीं जानता है,  वही सुशील पाराशर खंडवा के पंधाना के एक छोटे से गांव से शुरुआत की थी,

और अपने कई साथियों को डाक टिकट संग्रह करने में बहुत आगे बढ़ाया। उन्हीं के दिए इस हुनर को साथी मित्रों ने अपना करियर भी बनाया है बचपन से शौक जवानी और बुढ़ापे तक एक जुनून बन गया डाक टिकट संग्रह करना हजार से अधिक डाक टिकटों का संग्रह है।

जिनमें भारत सहित अन्य देशों की धर्म, संस्कृति, सामाजिक व राजनीतिक जानकारियों सहित अन्य अवसरों पर जारी डाक टिकट शामिल हैं। डाक-टिकट किसी भी देश की विरासत की चिन्नमय कहानी हैं। डाक-टिकटों का एक संग्रह विश्वकोश की तरह है,

जिसके द्वारा हम अनेक देशों के इतिहास, भूगोल, संस्कृति, ऐतिहासिक घटनाएँ, भाषाएँ, मुद्राएँ, पशु-पक्षी, वनस्पतियों और लोगों की जीवनशैली एवं देश के महानुभावों के बारे में बहुत सारी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

डाक-टिकट का इतिहास करीब 177 साल पुराना है। विश्व का पहला डाक टिकट 1 मई, 1840 को ग्रेट ब्रिटेन में जारी किया गया था, जिस पर ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का चित्र छपा था।

हिंदू देवी देवताओं पर अन्य देशों ने भी डाक टिकट जारी किए

सुशील पाराशर के पास भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों वाले ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों पर डाक टिकट है जो थाईलैंड ने जारी किया था, इसके साथ भगवान श्री गणेश के डाक टिकट भी जारी किए गए जो नेपाल सरकार ने जारी किए थे।

उसका भी संग्रह है महर्षि वाल्मीकि और  रामायण के सभी कांड के डाक टिकट भी उपलब्ध है। महाभारत की पूरी कहानी एवं कोरिया ने जो डाक टिकट जारी किया है संकट मोचन हनुमान पहाड़ लेकर जा रहे हैं उसका डाक टिकट भी उनके पास है।

साथ ही भगवान श्री कृष्ण गोपियों के वस्त्र छुपा रहे हैं उसका डाक टिकट भी उनके पास है इसके डाक टिकटों मैं स्काउट गाइड  भारत सरकार द्वारा जो जारी किए गए हैं डाक टिकट उसका भी डाक टिकट उनके पास पूरा उपलब्ध है का भी अनोखा संग्रह मौजूद है। ये दुर्लभ डाक टिकट देखने लोग उनके पास आते हैं।

डाक टिकटों के विवरण पत्रों में कई त्रुटियां सुधार हो

खंडवा के वरिष्ठ डाक टिकट संग्रह करता सुशील पाराशर ने बताया कि भारत सरकार ने डाक टिकट कई महान हस्तियों पर जारी किए गए हैं लेकिन उसमें विवरण पत्र जो जारी किए गए हैं उसमें कुछ त्रुटियां भी है।

जैसे कि भारत सरकार द्वारा रविंद्र नाथ ठाकुर पर जारी किया गया डाक टिकट और विवरण पत्र 7 मई 2011 को जिसमें इस विवरण पत्र में कहीं भी जन गण मन अधिनायक जय हे का उल्लेख नहीं है वही होलकर रियासत के इतिहास से भी छेड़छाड़ की गई है।

होलकर रियासत के इतिहास के साथ भी डाक विभाग द्वारा छेड़छाड़ की गई है डाक विभाग द्वारा जो डाक टिकट जारी किया गया है उसमें पुत्रवधू को बताया है पुत्री देवी अहिल्या को मल्हार राव होलकर की बेटी बताया है। यह डाक टिकट 6 अक्टूबर 2010 को जारी किया गया था इसमें भी बड़ी टूटी नजर आ रही है जिसको सुधार होना चाहिए

किशोर दा की जन्मस्थली को भूले

किशोर दा सबसे ज्यादा अपने खंडवा से प्रेम करते थे उनका जन्म भी खंडवा में हुआ था और अंतिम संस्कार भी खंडवा में ही हुआ डाक विभाग द्वारा उनके ऊपर जो डाक टिकट जारी किया था और विवरण पत्र उसमें कहीं भी खंडवा जन्मस्थली का उल्लेख नहीं है।

यह डाक टिकट 15 मई 2003 को जारी किया गया था यह भी एक बड़ी टूटी है इसको सुधार किया जाना चाहिए किसके साथ डाक विभाग द्वारा 14 नवंबर  2006 बाल दिवस के अवसर पर मेनी सीट्स की जानकारी तकनीकी आंकड़े में नहीं दर्शाई गई है।

कितनी मीनिंएयर सीट्स जारी की गई है यह भी एक भूल की गई है  इसको भी सुधार किया जाना चाहिए
मोदी सरकार में भी जारी टिकटों में मोहन से महात्मा तक का सफर तय किया गया है। इसमें से आठ जनवरी 2015 को महात्मा गाधी की वापसी के 100 वर्ष पूरे होने पर, डू और डॉय आदि टिकट खूब पसंद किए गए। साथ ही चरखे पर भी डाक टिकट जारी किए गए।

विभूतियों को किया याद

बाबा आमटे, हसरत मोहानी, दीनदयाल उपाध्याय, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, महंत अवेद्यनाथ, डॉ. बी.आर. आबेडकर और भारत का संविधान, दशरथ माझी, कर्पूरी ठाकुर, कैलाशपति मिश्र, संत टेरेसा, डॉ. शभुनाथ सिंह, नाना जी देशमुख, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीलाल शुक्ल, भीष्म साहनी, डॉ. एमजी रामचंद्रन और पृथ्वीराज चौहान (4 टिकट) समेत तमाम विभूतियों को समर्पित डाक टिकट खास रहे।

संगीत जगत के दिग्गजों के सम्मान में भी डाक टिकट जारी किए गए। संयुक्त डाक टिकट भी है। कई राज्यों में मध्य प्रदेश का नाम रोशन किया. सुशील पाराशर ने डाक टिकट संग्रहण कर्ताओं की राष्ट्रीय और प्रदेश लेवल पर अपने मध्य प्रदेश का नाम रोशन किया है।

वे दिल्ली, गुजरात इलाहाबाद, चैन्नई, केरल, भोपाल, रायपुर आदि जिलों में लगने वाली डाक टिकटों कह प्रदर्शनी में भाग भी लिया है।

सरकार को पहल करनी चाहिए युवाओं को जोड़ने के लिए

सुशील पाराशर ने बताया कि चिट्ठियां तो अब नहीं आतीं, लेकिन उन चिट्ठियों पर लगने वाले टिकट की यादें आज भी ताजा हैं। डाक टिकटों को इकट्ठा कर उन्हें संरक्षित करना कई सारे लोगों का शौक होता है। कई लोग तो बचपन से ही इसके शौकीन होते हैं।

इसी शौक ने डाक टिकट की प्रासंगिकता बरकरार रखी है। बच्चों में इसके प्रति जुनून पैदा करने और उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए सरकार आगे आना चाहिए और इसके लिए आयोजन भी करनी चाहिए और सरकार को युवाओं को जोड़ना चाहिए।

ताकि हमारी लोक कला संस्कृति और हमारे धरोहर इतिहास सब की जानकारी मिलती रहे डाक टिकट संग्रह करने के शौकीन बच्चों को प्रोत्साहित कर इस शौक के बारे में लोगों में जागरूकता पैदा करना।

यह भी पढ़ें: स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने कहा कि अब दिल्ली में लॉकडाउन करने का कोई फायदा नहीं होगा