बंद पड़े प्राइवेट स्कूलों की बेतहाशा फीस जमा करने का आदेश देना क्या न्यायालय का काम है?

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प्रदीप मिश्रा इंदौर. क्यों दे बंद पड़े प्राइवेट स्कूलों की ट्यूशन फीस ये सरकार बताए। पिछले 8 महीनों में क्या और कैसे पढ़ा दिया स्कूलों ने और किन टीचरो ने पढ़ा दिया। कितने टीचर और अन्य स्टाफ को नौकरी से निकाला गया है।

कितनों को 50 फीसदी से भी कम सैलरी दी गई है. क्या इसके आकड़े सरकार या जिला शिक्षा विभाग के पास है। मार्च से लेकर आज तक तकरीबन 8 महीने से कोरोना संक्रमण महामारी की वजह से प्रदेश के सभी प्राइवेट स्कूल पूरी तरह बंद है।

दूसरी तरफ लाखो लोग बेरोजगार हो गए हैं। अधिकांश लोगों के काम धंधे और व्यवसाय बुरी तरह प्रभावित हो चुके हैं। ऐसे समय प्राइवेट स्कूल जो विशुद्ध व्‍यवसायिक और पेशेवर तरीके से वर्षो से स्कूल संचालित करते आ रहे हैं।

उनके द्वारा लॉक डाउन के दौरान बंद पड़े स्कूलों के बच्चों के अभिभावकों से फीस मांगना किस नेतिकता या कानूनी रूप से जायज है। करोड़ो रुपए काशन मनी, एडमिशन फीस और अन्य सुविधाओं के नाम पर वर्षो से लेते आ रहे है।

ये विशुध्द व्‍यवसायिक प्राइवेट स्कूल जो शहर के बड़े व्यापारियों, उद्योगपतियो, बिल्डरों, शराब व्यवसायीयों, धन्ना सेठों के ट्रस्टों, द्वारा शुद्ध मुनाफे की नीयत से संचालित किए जा रहे हैं। किस बात के लिए बच्चों से फीस के लिए दवाब बना रहे हैं।

अधिकांश स्कूलों ने अपने यहां के टीचिंग स्टाफ और अन्य स्टाफ को अस्थायी रूप से नौकरी से हटा दिया है! कुछ गिने चुने टीचर को कुल सैलरी का मात्र 25 से 50 फीसदी भुगतान किया जा रहा है।

कल माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर ने न जाने किस आधार पर ट्यूशन फीस लेने का आदेश इन प्राइवेट स्कूलों को दिया है। क्या माननीय न्यायालय के पटल पर बड़े स्कूलों की सालाना फीस कितनी है। उसका लेखा-जोखा रखा गया था।

टीचर और अन्य स्टाफ को स्कूल बंद के दौरान कितनी सैलरी दी गई। कितनों को घर बैठा दिया गया!? टीचिंग के अलावा अन्य स्टाफ जैसे बस ड्राईवर, स्टाफ और अन्य नौकरी पर है कि उन्हें भी बैठा दिया गया है।माननीय उच्च न्यायालय द्वारा सिर्फ 20 फीसदी सैलरी टीचरो की काटने को कहा है।

और उसे भी सामन्य हालात होते ही 6 महीनों में मासिक इंस्टॉलमेंट मे वापस देने के आदेश दिए है! कौन स्कूलों की मोनिटरिंग करेगा, कि वो हाई कोर्ट के आदेश का सैलरी देने मे अक्षरशः पालन करेंगे। बंद पड़े स्कूलों की फीस का मुद्दा सरकार को हल करना चाहिए था। लेकिन उसने अपनी जिम्मेदारी न्यायालय पर थोप दी।

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