सपोलों, आस्तीनियों और सपेरों की जुगलबंदी और व्यवस्था की व्यथा

नगर निगम उज्जैन ठेकेदार सपोलों आस्तीनियों

जय कौशल उज्जैन. वर्तमान दौर में व्यवस्था पूरी तरह चरमराई हुई है.और आवाम सम्पट भूल बैठी है कि आख़िर जो भी कुछ हो रहा है, वो कैसे और क्यों हो रहा है. इन दो सवालों का जवाब जनता लोकतंत्र के मालिकों से जानना चाहती है. इन सवालों के दायरे में लोग छटपटा रहे हैं.

लेकिन जिम्मेदार हुक्मरान हैं कि सब सामने आईने के समान होने के बाद भी पारदर्शिता को अपारदर्शी बना रहे हैं ख़ैर हम भी न्याय सुनाने वाले कौन हैं. ज्ञान का संज्ञान भी कोई चीज़ होती है.

ज्ञान, संज्ञान और न्याय अन्याय

कुछ दिनों पहले अपने कारनामों से हमेशा चर्चाओं में रहने वाले नगर निगम उज्जैन के एकयुवा कद्दावर ठेकेदार की मौत ने भूचाल सा ला दिया है. प्रेस खुद न्यायालय हो गई है. जिसने कई दिनों पहले लिखे गए एक सोसाइट नोट को आधार मान कर निगम के दो अधिकारियों को मुल्जिम की जगह मुज़रिम बना दिया.

ऐसा नहीं है कि दोनों इंजीनियर पाक साफ़ होंगे. लेकिन यहाँ ये भी ग़ौर तलब है कि मरहूम ठेकेदार की छवि भी कोई साफ़ नहीं थी. वो एक मीडियाकर्मी पर प्राणघातक हमले का आरोपी था जो न्यायालय से बेल (ज़मानत) ले कर अपनी कारगुजारियां कर रहा था.

नशे का आदी ये ठेकेदार इससे पहले भी कई ग़ैर क़ानूनी खुराफातों को अंजाम दे चुका था. अगर पुलिस इसके रिकॉर्ड खंगाले तो कई जाले साफ होंगे उन फाइलों से जो दफ़्न हैं. दूसरी मुद्दे की बात पोस्टमार्टम रिपोर्ट में क्या आया है.

उससे स्पष्ठ हो जाएगा कि ठेकेदार ने खुदकुशी की या ये वाकई कोई दुर्घटना थी. तीसरी बात दो गाड़ियों से टकराने के बाद ठेकेदार की गाड़ी चकनाचूर हुई और आत्महत्या का ये तरीका कैसा था.

चौथी बात सूत्र बताते हैं जो सोसाइट नोट मिला वो मरहूम होने के कई दिनों पहले से ठेकेदार जेब में लिए लिए घूम रहा था. तो ये था चमकाने का प्लान. और इसी सूत्र पर ठेकेदार दोनों निगमकर्मियों को चमका रहा था.

चमकाने का मास्टरमाइंड था ठेकेदार

जिस ठेकेदार की मौत की वजह निगमकर्मियों को माना जा रहा है. उसे चमकाने के गुरु मंत्र कई पाठशालाओं में मिलें हैं. जान लेवा हमले के इस ज़मानती आरोपी को जेल यात्रा के दौरान और उससे पहले इसके एक अन्य गुरु जिसके कारण इसने पत्रकार पर जान लेवा हमला किया था।

उससे भी मिले थे. ये मारपीट और धौंसडपट डराने चमकाने के साथ ही वसूली करने का भी आदी हो चुका था। और जिस वार्ड के काम का उल्लेख हो रहा है वहाँ के काम के भी ये ग़ैर वाज़िब बिल पास करवाना चाह रहा था.

यही कारण था कि निगम के अधिकारियों पर ये दबाव बना कर ग़ैर क़ानूनी काम करवाना चाहता था. उपरोक्त कारणों को ध्यान का संज्ञान लेकर अगर बारिकी से जाँच हो तो सब साफ हो जाएगा.

बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाने

इस कारागार की हवा खा चुके मरहूम ठेकेदार की मौत को लेकर कई बातें तो हो ही रहीं हैं। लेकिन कमाल का वाक्या तो ये है कि ठेकेदारों के एक संगठन ने एक ज्ञापन पुलिस प्रशासन को दिया है ठेकेदार के समर्थन में अब ये संगठन नगरनिगम का ना हो कर ये पीडब्ल्यूडी का था.

जिसका नगरनिगम से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था. ऐसे में ऐसी क्या ज़रूरत आन पड़ी इस संगठन को कि उसने आव देखा ना ताव और ज्ञापन दे डाला. मैं यहाँ स्पष्ठ कर दूं कि जब मीडियाकर्मी पर जानलेवा हमला किया गया था.

तो नगर निगम के उस आला अधिकारी के समर्थन में ठेकेदारों के एक संगठन विशेष ने ज्ञापन देकर हमलावरों और उनके सरगना को पाक साफ़ बताया था. इस बात का उल्लेख यहाँ आप सुधि पाठकों के बीच इसलिए किया जा रहा है,

कि इस पूरे मामले को पेचीदा बनाया जा रहा है…हमारे कुछ आस्तीनियों ने भी उस मामले में हमलावरों का शिद्दत से साथ दिया था. जिन्हें वक़्त आने पर बेपर्दा किया जाएगा. लेकिन इस मामले को गम्भीरता से लेते हुए इस पर संज्ञान लेना जरूरी है.

यहाँ कोई सफा नहीं

यहाँ ये भी सही है कि पूरे नगरनिगम में अगर कानून तौर पर खोजबीन की जाए तो बहोत कम सही मिलेंगे. किसी की नियुक्ति ग़लत है. तो कोई ग़ैर वाज़िब पद पर यहाँ डटा हुआ है. कोई डूडा का बाबू है, तो कोई टाईम कीपर है.

तो किसी ने नियुक्ति ही ग़लत सलीके तरीके से जमा रखी है. तो कोई चतुर्थश्रेणी से क्लास टू पर पहुंच कर रौबदार पद हथियाए बैठा है. और यही कारण है कि कोई भी ऐरा गेरा जब चाहे तब किसी भी अधिकारी की झूठी रिपोर्ट हरिजन थाने में कर देता है.

तो कभी यहाँ के षड्यंत्रकारी अधिकारी ही मिली भगत से निगमायुक्त की ही फर्जी शिकायत लोकायुक्त और इओडब्यू में कर देते हैं. षड्यंत्र के जादूगरों की यही जादूगरी कभी कभी भस्मासुरों को भी जन्म दे देती है.

और सपोले अपने ही सपेरों को डसने से नहीं चूकते, जिसमें साथ देते हैं इन्हीं के आस्तीनिये कभी इन सपेरों, सपोलों और आस्तीनियों की जुगलबंदी फेल भी हो जाती है. ये संगठित अपराध करने वाले कभी इतना दबाव बनाते हैं,

कि किसी संत (हाथी वाले बाबा) को अपने प्राण त्यागने पड़ते हैं. तो कभी ये किसी का भी वैध घौंसला (मकान) बिखेरने से भी गुरेज़ नहीं करते. इन संगठित अपराधियों के कारण ही अवैध वैध हो जाते हैं और वैध अवैध बाद में मोती नगर और शांति पैलेस जैसे हालात पैदा होते हैं. असल गुनाहगार ये जिम्मेदार सपेरे भी हैं.

एक उम्मीद पर टिकी सबकी नजरें

नगर निगम बोर्ड के भंग हो जाने के बाद माननीय संभागायुक्त अब नगरनिगम के प्रशासक हैं. और उनकी निश्चल कार्यप्रणाली से पूरा प्रदेश वाकिफ़ है. अगर सभी बिंदुओं को देख परख कर सही न्याय की जाँच करें और निष्पक्ष फैसले के साथ इस मामले का पटाक्षेप होगा.

यही उम्मीद की एक किरण है. वहीं अपनी तर्राट कार्यप्रणाली के लिए मशहूर पुलिस कप्तान भी चीनी पिस्सू कोरोना को मात दे कर वापस मैदान में हैं और वो भी इस मामले में अपनी कार्य कौशलता का ब्रह्मास्त्र चला कर इसे सटीक निर्णय पर पहुंचाएंगे यही कामना है . जो भी हो न्याय हमेशा यही कहता है, कि कभी भी निर्दोष के साथ अन्याय ना हो. और यही आज की मांग भी है.

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