उज्जैन: अंकुश्ता और निरंकुशता के बीच लहूलुहान हैं व्यवस्था

नगर निगम उज्जैन व्यवस्था

जय कौशल उज्जैन. व्यवस्था और अव्यवस्था के बीच की बानगी लेकर अंकुश और निरंकुश ये महज़ दो शब्द नहीं हैं. ये किसी भी व्यवस्था के दो आधार स्तम्भ हैं। एक से व्यवस्था बनती है। और दूसरे से बनी बनाई व्यवस्था चरमरा जाती है,

लोक-हित में अंकुश्ता बहुत जरूरी है लेकिन जब व्यवस्था को निरंकुशता का कीड़ा लगता है तो वो उसे दीमक की तरह पूरी तरह से खोखला कर देता है ऐसे में अगर व्यवस्थापिका और कार्यपालिका भी निरंकुशता की चपेट में आ जाए,

तो न्याय पालिका पर ही सब कुछ निर्भर हो जाता है वर्तमान हालात में अंकुश्ता पर निरंकुशता इस कदर हावी है कि वो कुछ भी अवैधानिक करने से नहीं चूक रही है ये एक नहीं कई कई मर्तबा साबित हो गया है हाल ही में एक चौंकाने वाले निर्णय ने व्यवस्था को कटघरे में फिर से घसीट लिया है।

झींझर कांड में बड़े बड़े अधिकारियों पर गाज गिरी लेकिन सज़ा के असल जिम्मेदार को क्लीन चिट दे दी गई है जबकि प्रदेश की राजधानी से आई एसआईटी की टीम और निगम प्रशासक (संभागायुक्त) ने भी इन अधिकारी महोदय जिनकी मूल पदस्थापना कहीं।

और है को दोषी पाया था उन्हें निर्दोष साबित कर निलंबन से बहाल कर दिया गया है ..क्यों और कैसे?????

“नीति ,नियति और नियत”

दरअसल नीति नियति और नियत का ही ये ताल मेल है कि 17 अक्टूबर को ही नगर निगम उज्जैन के सहायक आयुक्त सुबोध जैन को संभागायुक्त और प्रशासक के पत्र क्रमांक एफ 01 विकास दो 5506 के आधार पर तत्काल प्रभाव से निलंबित करके सम्भागीय नगरीय प्रशासन विभाग उज्जैन में अटैच कर दिया गया था,

लेकिन सूत्र बताते हैं कि निलंबित सहायक आयुक्त ( मूल पद राजस्व निरीक्षक) ने निलंबन अवधि बहाली की मुद्दत तक अटैचमेंट विभाग में अपनी आमद तक नहीं दी और वाहन भी जमा नहीं करवाया (वर्कशॉप के सूत्रों के हवाले से) ऐसा क्यों और कैसे हो गया ?????

“रसूख़दारी भारी क़ायदे क़ानून पर”

अब हम एक बार और यहाँ स्पष्ठ कर दें कि रसूख़दारी उज्जैन नगर-निगम पर इस तरह हावी है कि एक गैंग मेन यहाँ उप यंत्री और एक शिक्षक प्रति-नियुक्ति पर आकर यहाँ सहायक आयुक्त तक के ओहदों तक पहुँच जाते हैं।

जबकि असल हक़दार एक मामूली सी चपरासी की नौकरी हासिल नहीं कर पाते हैं. झींझर कांड में भोपाल से आई टीम ने तहक़ीक़ात के बाद जिस कथित सहायक आयुक्त को दोषी पाया और प्रशासक महोदय के आदेश पर महज़ निलंबन की गाज गिरी,

वो राजस्व निरीक्षक (ये नियुक्ति भी संदेहास्पद) महज़ डेढ़ पखवाड़े (07 दिसम्बर) में निलंबन के बाद अपने रसूख़ से बहाल हो कर फिर अपनी कारगुजारियों को अंजाम देने के लिए मैदान में कमर कस के तैयार है इसका कारण रसूख़ और न्यौछावर (घूस) हैं ।

ऐसे में पूरी व्यवस्था ही शंका और कुशंका के चक्रव्यूह में घिरी नज़र आती है ऐसा क्यों और कैसे..?????

“एक नहीं कई कई कर्मकांडों के कर्ताधर्ता”

राजस्व निरीक्षक, सहायक आयुक्त, शिक्षक, डूडाकर्मी श्रीमान के कारनामों की फ़ेहरिस्त बहोत लम्बी है और अगर पूरी ईमानदारी से इनकी जाँच पड़ताल हो तो ये महाशय श्री कृष्ण जन्मस्थली के हक़दार निकलेंगे , हालांकि जाँच एजेंसी लोकायुक्त भी इनके पीछे पड़ी है।

और सबसे बड़ा कांड जिसमें क़रीब डेढ़ दर्जन मासूमों की अकाल मौतें हुईं उसके भी असल सूत्रधार ये महोदय ही रहे हैं. एसआईटी की टीम से भी इनके चाहने वालों ने इस बात को छुपाए रखा था लेकिन जब जलवा टीम ने एस आईटी प्रमुख को वास्तविकता से रूबरू करवाया था।

तब जाकर ये रसूखदार बाबू जी निलंबन के घेरे में आए थे क्योंकि जिस बिल्डिंग में नकली शराब जन्मती थी मतलब बनती थी वो इन ज़नाब के ही अंडर में थी और तीसरी मंजिल पर ज़हरीली झींझर पकती थी और इनका कार्यालय भी उसी इमारत के दूसरी मंजिल पर पैबस्ता था तो ऐसे में ये असम्भव था।

कि इनकी बग़ैर जानबूझी के ये कर्मकांड हो रहा था वो भी ना जाने कब से ये तो उस दिन कैमिकल की मिलावट की मात्रा का लौचा हो गया वरना ये मुसल्सल जारी ही रहता , ख़ैर इस मामले में औरों को सज़ा और इन्हें माफी कैसे…..????

“सत्ताधारियों के लेटर भी बेअसर”

जिस झींझर कांड में क़रीब डेढ़ दर्जन लोग बेमौत मारे गए और कइयों को सजा के तौर पर कारागार की हवा खानी पड़ रही है और तो और ईमानदार दबंग पुलिस कप्तान और अन्य ओहदेदारों तक को इसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ा और जो कारागार में बन्द हैं।

उन्हें ज़मानत तक नसीब होने के लाले पड़ रहे हैं ऐसे में इनके रसूख़ और आकाओं को लानत है । लोकप्रिय सांसद और विधायक के पत्र निगम के गलियारों में महज़ कुछ पल की सनसनी फ़ैला पाए और उसके बाद का ये निलंबन से बहाली का नतीजा सामने आया है ।

हालांकि अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है अगर इस फ़ैसले पर फिर से ग़ौर ना किया गया तो लहूलुहान व्यवस्था घूस की न्यौछावर के आगे घुटने टेक कर निरंकुशता का वो भौंडा नाच नाचेगी कि बेचारी आवाम आवक हो कर सिवाय अपनी ईह लीला (जीवन लीला)समाप्त करती दिखेगी, आख़िर कब तक इस तरह अंकुश्ता निरीह हो कर तड़पती रहेगी…कब तक?????

“न्यायपालिका पर अब भी विश्वास की आस”

नगरनिगम में इन महोदय के रहते कई कारनामों की किताब के कई पन्ने अभी खुलने बाकी हैं. लेकिन नियुक्ति और पदोन्नति ही बहोत बड़ा सवाल है इस व्यवस्था पर अब इस मामले में जिम्मेदार कुछ करें,

या ना करें ये उनका विवेक (अगर है तो), लेकिन अब ये मामला पीआईए के माध्यम से न्याय के मंदिर में भी गूंज सकता है और इसमें सभी जिम्मेदारों की जिम्मेदारी कटघरे में खड़ी नज़र आ सकती है!!!!!!!

मैं यहाँ स्पष्ठ कर दूं कि हमारा किसी से कोई निजी मामला नहीं है बस व्यवस्था और अव्यवस्था की बानगी सच्चाई के साथ सामने लाकर अंजाम तक पहुंचाना हमारा मकसद है, लेकिन यहाँ ग़ौरतलब ये भी है कि जिन प्रशासक महोदय के आदेश पर निलंबन हुआ उन्हें बहाली की ख़बर तक नहीं होना आश्चर्यजनक किंतु सत्य है।

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